उदयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेन्द्र सिंह तंवर (72) का निधन बुधवार, 2 अप्रैल को प्रातः 10 बजे उदयपुर में हो गया। श्वास एवं अस्थमा संबंधी बीमारी के चलते उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। पिछले दो दिनों से उनका इलाज चल रहा था, वहीं बुधवार को उन्होंने अस्पताल में अंतिम सांस ली। इसके पश्चात उनकी पार्थिव देह अंतिम दर्शन हेतु शिवाजी नगर,उदियापोल स्थित संघ कार्यालय, केशव निकुंज लाया गया, जहाँ कार्यकर्ताओं ने उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद उनकी पार्थिव देह को उनके पैतृक गांव कुशलगढ़ ले जाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
संघ परिवार द्वारा उदयपुर में शोक सभा का आयोजन दिनांक 7 अप्रैल, सोमवार को सायं 5:30 बजे सेक्टर 4 स्थित विद्या निकेतन विद्यालय में किए जायेगा।
आरंभिक जीवन
संघ के प्रचार विभाग के अनुसार, मूलतः कुशलगढ़ (बांसवाड़ा) निवासी राधा किशन सिंह एवं लहरी बाई के पुत्र सुरेन्द्र सिंह का जन्म 12 फरवरी 1953 को हुआ था। उनके परिवार में छह भाई एवं एक बहन थीं। सुरेन्द्र सिंह बाल्यकाल से ही संघ से जुड़ गए थे।
संघ शिक्षण
सुरेन्द्र सिंह ने सन 1978 में बांसवाड़ा से संघ का प्रारंभिक शिक्षा वर्ग किया। प्रथम एवं द्वितीय वर्ष का शिक्षण उन्होंने क्रमशः 1979 एवं 1983 में उदयपुर में पूरा किया। संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने तृतीय वर्ष 1984 में नागपुर से संपन्न किया।
प्रचारक जीवन
प्रचारक बनने से पूर्व उनका दायित्व तहसील कार्यवाह का रहा। वे 1988 में विस्तारक निकले एवं 1990 तक कुम्भलगढ़ तहसील विस्तारक रहे। इसके पश्चात दो वर्ष कुम्भलगढ़, भीम और देवगढ़ तहसील प्रचारक के रूप में कार्य किया। 1992 से 1995 तक वे उदयपुर ग्रामीण के जिला प्रचारक रहे। इसके बाद छह वर्षों तक उन्होंने ब्यावर में संघ कार्य किया।अजमेर में तीन वर्षों तक कार्य करते समय वे एक वर्ष प्रांत के धर्म जागरण प्रमुख रहे और दो वर्षों तक हिन्दू जागरण मंच में प्रांत के संगठन मंत्री का कार्यभार संभाला। सन 2004 से वर्तमान 2025 तक उनका कार्यक्षेत्र उदयपुर रहा, जहाँ 2009 तक वें हिन्दू जागरण मंच के प्रांत संगठन मंत्री एवं 2009 से क्षेत्र संगठन मंत्री के दायित्व का निर्वहन कर रहे थे।
संकट में कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहने का स्वाभाविक गुण
"कैसी भी परिस्थिति हो, मेरा कार्यकर्ता सदैव सफल हो," यह उनका दृढ़ विश्वास था। संकट की घड़ी में कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहना उनका स्वाभाविक गुण था। स्वयं ने निडरता व आत्मविश्वास से जीवन जिया और कार्यकर्ताओं में भी इसी गुण को रोपित किया।