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श्रावणी कर्म 31 अगस्त की प्रभात में होगा

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19 Aug 23
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श्रावणी कर्म 31 अगस्त की प्रभात में होगा

बांसवाड़ा/इस वर्ष 30 अगस्त, रक्षाबंधन के दिन भद्रा होने से शुक्ल यजुर्वेदीय परम्परा के द्विजों के लिए श्रावणी कर्म अबकि बार 31 अगस्त 2023, श्रावण शुक्ल पूर्णिमा गुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः 4 बजे बाद से लेकर प्रातः 7 बजे तक किया जा सकता है।

इस बारे में प्राच्यविद्या, ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड आदि से जुड़े विद्वानों ने विभिन्न धर्मशास्त्रों में वर्णित तथ्यों को लेकर गहन चिन्तन-मनन के बाद यह निष्कर्ष सामने रखा है।

इसमें बताया गया कि रक्षाबंधन के दिन 30 अगस्त 2023, बुधवार को प्रातः 10.59 तक चतुर्दशी रहेगी। इसके उपरान्त प्रातः 10.59 से पूर्णिमा तिथि का प्रवेश होगा लेकिन रात्रि 9 बजे तक मृत्यु लोक की भद्रा विद्यमान रहेगी।

इस दिन भद्रा काल में रक्षा बंधन और श्रावणी कर्म (द्विजों के लिए नूतन यज्ञोपवीत धारण) पूरी तरह वर्जित है। इस बारे में निर्णय सिन्धु ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है - भद्रे द्वै न कर्त्तव्यं श्रावणी फाल्गुनी तथा, श्रावणी नृपति हन्ति ग्रामो दहति फाल्गुनी।

इसे देखते हुए राखी बांधने का कार्य 30 अगस्त बुधवार को भद्रा समाप्त होने के उपरान्त रात्रि 9 बजे के पश्चात् हो सकता है।

इस बारे में गायत्री मण्डल बांसवाड़ा की पहल पर हुए पारस्परिक चर्चा सत्र एवं वर्चुअल संवाद में नक्षत्र ज्योतिष शोध संस्थान, उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. भगवतीशंकर व्यास, पं. लक्ष्मीनारायण शुक्ल, पं. मोहनलाल शुक्ल, पं. कुलदीप शुक्ल(तलवाड़ा), पं. अवध बिहारी भट्ट, पं. मनोज त्रिवेदी, पं. गोपीकृष्ण भट्ट, पं. देवेन्द्र शुक्ल, पं. रामेश्वर जोशी, पं. मनोज जोशी(बांसवाड़ा), पं. प्रदीप शुक्ला एवं पं. नरेन्द्र आचार्य(छींछ), पं. दीपक शुक्ला(परतापुर), पं. राकेश शुक्ला(सरेड़ी बड़ी) आदि अनेक जानकारों, आचार्य कर्म कर्ताओं, ज्योतिषियों एवं कर्मकाण्डियों ने शास्त्रोक्त प्रमाणों के आधार पर सर्व सम्मत राय व्यक्त की है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यजुर्वेदियों के लिए श्रावणी कर्म में पूर्णिमा की प्रधानता स्वीकारी गई है ऐसे में अगले दिन गुरुवार को भोर में श्रावणी कर्म संभव है।

इनमें यह राय व्यक्त की गई कि 31 अगस्त 2023, गुरुवार को प्रातःकालीन पूर्णिमा की न्यून अवधि को देखते हुए संक्षिप्त श्रावणी कर्म के अन्तर्गत प्रायश्चित संकल्प, पंचगव्य प्राशन, मार्जन, गौदान संकल्प, यज्ञोपवीत धारण, ऋषि पूजन, तर्पण आदि कर्म का निर्धारण किया जा सकता है। लेकिन ये सारे कर्म प्रातः 7 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त होने से पूर्व तक हर हालत में संपादित कर लिए जाने चाहिएं।

गायत्री मण्डल के वरिष्ठ प्रतिनिधि पं. अवध बिहारी भट्ट ने कहा कि शास्त्रोक्त मत के अनुसार भद्रा काल में श्रावणी कर्म निषिद्ध है तथापि इन विद्वानों के अनुसार श्रावणी कर्म के मामले में देश, काल परिस्थितियों एवं स्थानीय स्तर पर सर्वसम्मत यथोचित निर्णय लेने के लिए स्थानीय आचार्य एवं श्रावणी कर्मकर्ता स्वतंत्र होंगे।


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